गुरु पूर्णिमा का महत्व

गुरु पूर्णिमा का महत्व गुरु पूर्णिमा पर विशेष ज्ञान

नमस्कार दोस्तों गुरु पूर्णिमा पर्व को मनाने से पूर्व मेरी आप सभी से करबद्ध प्रार्थना है कि यह मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता और इस मनुष्य जन्म का मूल उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति करना है और परमात्मा की प्राप्ति बिना सच्चे गुरु के नहीं हो सकती इसलिए गुरु पूर्णिमा पर्व पर आज मैं आपके सामने प्रमाणित तथ्य रख रहा हूं इस पर आप विचार मंथन जरूर करें दोस्तों गुरु की पहचान किसी के कहे अनुसार नहीं करनी चाहिए हमारे पूर्वजों ने हमारे सद ग्रंथो ने जिसमें वेद गीता कुरान बाइबल श्री गुरु ग्रंथ साहिब आदि आदि वेद शास्त्र जो है उनमें जो गुरु की पहचान बताई है ऐसे लक्षणों वाला गुरु ही सच्चा गुरु होता है इसलिए एक बार अपने शास्त्रों को खंगाले और जो शास्त्रों में गुरु की पहचान बताई है उस अनुसार आप गुरु की खोज करें पहचान करें फिर उनका सानिध्य ले करके अपना मनुष्य जन्म सफल करें तो आइए मित्रो पढ़ते हैं गुरु पूर्णिमा पर विशेष ज्ञान गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹कबीर साहेब जी अपनी वाणी में कहते हैं कि-
जो मम संत सत उपदेश दृढ़ावै (बतावै), वाके संग सभि राड़ बढ़ावै।
या सब संत महंतन की करणी, धर्मदास मैं तो से वर्णी।।

कबीर साहेब अपने प्रिय शिष्य धर्मदास को इस वाणी में ये समझा रहे हैं कि जो मेरा संत सत भक्ति मार्ग को बताएगा उसके साथ सभी संत व महंत झगड़ा करेंगे। ये उसकी पहचान होगी। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹सिद्ध तारै पिंड आपना, साधु तारै खंड।
उसको सतगुरु जानियो, जो तार देवै ब्रह्मांड।।

साधक अपना ही कल्याण कर सकता है। परमात्मा से परिचित जो संत हुए हैं वो कुछ डिवीजन, खंड को ही लाभ दे सकते हैं। और सतगुरु उसको जानना जो पूरे विश्व का कल्याण कर दे। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹सतगुरु के लक्षण कहूं, मधूरे बैन विनोद।
चार वेद षट शास्त्र, कहै अठारा बोध।।

सतगुरु गरीबदास जी महाराज अपनी वाणी में पूर्ण संत की पहचान बता रहे हैं कि वह चारों वेदों, छः शास्त्रों, अठारह पुराणों आदि सभी ग्रंथों का पूर्ण जानकार होगा।

歹यजुर्वेद अध्याय 19 मंत्र 25, 26 में लिखा है कि जो वेदों के अधूरे वाक्यों अर्थात् सांकेतिक शब्दों व एक चौथाई श्लोकों को पूरा करके विस्तार से बताएगा व तीन समय की पूजा बताएगा। सुबह पूर्ण परमात्मा की पूजा, दोपहर को विश्व के देवताओं का सत्कार व संध्या आरती अलग से बताएगा वह जगत का उपकारक संत होता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹तत्वदर्शी सन्त वह होता है जो वेदों के सांकेतिक शब्दों को पूर्ण विस्तार से वर्णन करता है जिससे पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति होती है वह वेद के जानने वाला कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹 पूर्ण सन्त उसी व्यक्ति को शिष्य बनाता है जो सदाचारी रहे। अभक्ष्य पदार्थों का सेवन व नशीली वस्तुओं का सेवन न करने का आश्वासन देता है। पूर्ण सन्त उसी से दान ग्रहण करता है जो उसका शिष्य बन जाता है फिर गुरू देव से दीक्षा प्राप्त करके फिर दान दक्षिणा करता है उस से श्रद्धा बढ़ती है। श्रद्धा से सत्य भक्ति करने से अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति होती है अर्थात् पूर्ण मोक्ष होता है। पूर्ण संत भिक्षा व चंदा मांगता नहीं फिरेगा।

歹पूर्ण गुरु की पहचान
पूर्ण गुरु तीन प्रकार के मंत्रों (नाम) को तीन बार में उपदेश करेगा जिसका वर्णन कबीर सागर ग्रंथ पृष्ठ नं. 265 बोध सागर में मिलता है व गीता जी के अध्याय नं. 17 श्लोक 23 व सामवेद संख्या नं. 822 में मिलता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹संतों सतगुरु मोहे भावै, जो नैनन अलख लखावै।।
ढोलत ढिगै ना बोलत बिसरै, सत उपदेश दृढ़ावै।।
आंख ना मूंदै कान ना रूदैं ना अनहद उरझावै।
प्राण पूंज क्रियाओं से न्यारा, सहज समाधि बतावै।।

歹कबीर,सतगुरु के दरबार मे, जाइयो बारम्बार
भूली वस्तु लखा देवे, है सतगुरु दातार।
हमे सच्चे गुरु की शरण मे आकर बार बार उनके दर्शनार्थ जाना चाहिए और ज्ञान सुनना चाहिए।

歹गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में गीता ज्ञान दाता ने तत्वदर्शी संत (सच्चा सतगुरु) की पहचान बताते हुए कहा है कि वह संत संसार रूपी वृक्ष के प्रत्येक भाग अर्थात जड़ से लेकर पत्ती तक का विस्तारपूर्वक ज्ञान कराएगा। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹संत रामपाल जी महाराज ही एकमात्र सच्चे सतगुरु हैं जो शास्त्रों के बताए अनुसार तीन समय की भक्ति एवं तीन प्रकार के मंत्र जाप अपने साधकों को देते हैं जिससे उन्हें सर्व सुख मिलता है तथा उनका मोक्ष का मार्ग भी आसान हो जाता है।

歹जो भी संत शास्त्रों के अनुसार भक्ति साधना बताता है और भक्त समाज को मार्ग दर्शन करता है तो वह पूर्ण संत है अन्यथा वह भक्त समाज का घोर दुश्मन है जो शास्त्रो के विरूद्ध साधना करवा रहा है। इस अनमोल मानव जन्म के साथ खिलवाड़ कर रहा है। ऐसे गुरु या संत को भगवान के दरबार में घोर नरक में उल्टा लटकाया जाएगा। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जो सच्चा गुरु होगा उसके 4 मुख्य लक्षण होते हैं।

  1. सब वेद तथा शास्त्रों को वह ठीक से जानता है।
  2. दूसरे वह स्वयं भी भक्ति मन कर्म वचन  से करता है अर्थात उसकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होता।
  3. तीसरा लक्षण यह है कि वह सर्व अनुयायियों से समान व्यवहार करता है भेदभाव नहीं रखता।
  4. चौथा लक्षण यह है कि वह सर्व भक्ति कर्म वेदो ( चार वेद तो सब जानते हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद ,सामवेद, अथर्ववेद तथा पांचवा वेद सूक्ष्म वेद सरवन वेदो) के अनुसार करता और कराता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व

歹श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 – 4, 16, 17 में कहा गया है जो संत इस संसार रूपी उल्टे लटके हुए वृक्ष के सभी विभाग बता देगा वह पूर्ण गुरु/सच्चा सद्गुरु है।
यह तत्वज्ञान केवल संत रामपाल जी महाराज ही बता रहे हैं।

歹जब तक सच्चे गुरु (सतगुरू) की प्राप्ति नहीं होती है तब तक गुरु बदलते रहना चाहिए।

जब तक गुरु मिले ना सांचा।
तब तक करो गुरु दस पांचा।।

歹आज कलियुग में भक्त समाज के सामने पूर्ण गुरु की पहचान करना सबसे जटिल प्रश्न बना हुआ है। लेकिन इसका बहुत ही लघु और साधारण–सा उत्तर है कि जो गुरु शास्त्रो के अनुसार भक्ति करता है और अपने अनुयाईयों अर्थात शिष्यों द्वारा करवाता है वही पूर्ण संत है।

歹जैसे कुम्हार कच्चे घड़े को तैयार करते समय एक हाथ घड़े के अन्दर डाल कर सहारा देता है। तत्पश्चात् ऊपर से दूसरे हाथ से चोटें लगाता है। यदि अन्दर से हाथ का सहारा घड़े को न मिले तो ऊपर की चोट को कच्चा घड़ा सहन नहीं कर सकता वह नष्ट हो जाता है। यदि थोड़ा सा भी टेढ़ापन घड़े में रह जाए तो उस की कीमत नहीं होती। फैंकना पड़ता है। इसी प्रकार गुरूदेव अपने शिष्य की आपत्तियों से रक्षा भी करता है तथा मन को रोकता है तथा प्रवचनों की चोटें लगा कर सर्व त्राुटियों को गुरु पूर्णिमा का महत्व
निकालता है।

कबीर, गुरू कुम्हार शिष्य कुम्भ है, घड़ घड़ काढे खोट।
अन्दर हाथ सहारा देकर, ऊपर मारै चोट।।

歹सतगुरु मिले तो इच्छा मेटै, पद मिल पदे समाना।
चल हंसा उस लोक पठाऊँ, जो आदि अमर अस्थाना।।

इच्छा को केवल सतगुरु अथार्त् तत्वदर्शी संत ही समाप्त कर सकता है तथा यथार्थ भक्ति मार्ग पर लगा कर अमर पद अथार्त् पूर्ण मोक्ष प्राप्त कराता है।

歹कबीर, सतगुरु शरण में आने से, आई टले बलाय।
जै मस्तिक में सूली हो वह कांटे में टल जाय।।

सतगुरु अथार्त् तत्वदर्शी संत से उपदेश लेकर मर्यादा में रहकर भक्ति करने से प्रारब्ध कर्म के पाप अनुसार यदि भाग्य में सजाए मौत हो तो वह पाप कर्म हल्का होकर
सामने आएगा। उस साधक को कांटा लगकर मौत की सजा टल जाएगी।

歹बिन सतगुरू पावै नहीं खालक खोज विचार।
चौरासी जग जात है, चिन्हत नाहीं सार।। गुरु पूर्णिमा का महत्व

सतगुरू के बिना खालिक (परमात्मा) का विचार यानि यथार्थ ज्ञान नहीं मिलता। जिस कारण से संसार के व्यक्ति चौरासी लाख प्रकार के प्राणियों के शरीरों को प्राप्त करते हैं क्योंकि वे सार नाम, मूल ज्ञान को नहीं पहचानते।

歹कबीर, गुरू गोविंद दोनों खड़े, किसके लागूं पाय।
बलिहारी गुरू आपणा, गोविन्द दियो बताय।।

बिन गुरू भजन दान बिरथ हैं, ज्यूं लूटा चोर।
न मुक्ति न लाभ संसारी, कह समझाऊँ तोर।।

कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोनों निष्फल हैं, चाहे पूछो बेद पुरान।।

歹श्री नानक देव जी ने श्री गुरु ग्रन्थ साहेब जी के पृष्ठ 1342 पर कहा है:-
‘‘गुरु सेवा बिन भक्ति ना होई, अनेक जतन करै जे कोई’’

歹श्री गुरु ग्रन्थ साहिब पृष्ठ 946

बिन सतगुरु सेवे जोग न होई।
बिन सतगुरु भेटे मुक्ति न होई।
बिन सतगुरु भेटे नाम पाइआ न जाई।
बिन सतगुरु भेटे महा दुःख पाई।
बिन सतगुरु भेटे महा गरबि गुबारि।
नानक बिन गुरु मुआ जन्म हारि।

歹श्री नानक देव जी ने श्री गुरु ग्रन्थ साहेब जी के पृष्ठ 946 पर कहा है:-
‘‘बिन सतगुरु भेंटे मुक्ति न कोई, बिन सतगुरु भेंटे महादुःख पाई।’’

歹गुरु के समान कोई तीर्थ नहीं
श्री नानक देव जी ने श्री गुरु ग्रन्थ साहेब जी के पृष्ठ 437 पर कहा है:-
नानक गुरु समानि तीरथु नहीं कोई साचे गुरु गोपाल।

歹गरीब, अनंत कोटि ब्रह्मंड का एक रति नहीं भार।
सतगुरू पुरूष कबीर हैं कुल के सृजनहार।।

歹कबीर, दण्डवत् गोविन्द गुरू, बन्दू अविजन सोय।
पहले भये प्रणाम तिन, नमो जो आगे होय।।

歹गुरू बिन काहू न पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुष छड़े मूढ़ किसाना।
गुरू बिन वेद पढ़े जो प्राणी, समझे न सार रहे अज्ञानी।
कबीर, नौ मन सूत उलझिया, ऋषि रहे झख मार।
सतगुरू ऐसा सुलझा दे, उलझै ना दूजी बार।।

歹जो पूर्ण सतगुरु होगा उसमें चार मुख्य गुण होते हैं:-
गुरू के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्र को ज्ञाना (ज्ञाता)।
दूजे हरि भक्ति मन कर्म बानी, तीसरे समदृष्टि कर जानी।
चौथे वेद विधि सब कर्मा, यह चार गुरु गुण जानो मर्मा।

कबीर सागर के अध्याय ‘‘जीव धर्म बोध‘‘ के पृष्ठ 1960 पर ये अमृतवाणियां अंकित हैं। गुरु पूर्णिमा का महत्व

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