गुरू समान दाता भजन Lyrics

गुरू समान दाता भजन Lyrics

गुरू समान दाता जग में है नाहीं
(सन्त श्री कबीर जी की वाणी )

गुरू समान दाता जग में है नाहीं, सब सग मांगणहारा |
राजा प्रजा बादशाह, सब मिल हाथ पसारा ॥ टेर॥

तीन लोक के उपरे, सत शब्द का उचारा ।
सात द्वीप नव खण्ड़ में तहाँ सकल पसारा ॥ 1 ॥

अपराधी तीर्थ को चले, वो कांई तीर्थं तारे ।
काम क्रोध मद ना छूटे, खाली देही को बखाने ॥ 2 ॥

पत्थर को कांई पूजिये, फिर उसमे क्या पावे ।
अड़सठ तीर्थं फल मिले, जो कोई सन्त जिमावे ॥ 3 ॥

कागद की नौका बणी, मांयने लोहा भारा ।
शब्द भेद जाणे नाहीं, मूरख पच पच हारा ॥ 4 ॥

वचन मनोरथ गुरू मिले, घट भया उजियाला ।
सतगुरू पार उतारसी, सोई सन्त पुकारा ॥ 5 ॥

कहे कबीरसा धरमीदास ने, आन्धे को कांई सूझे।
आन्धे को नाहीं सूझे, सायब घट घट बोले ॥ 6 ॥ 

गुरू समान दाता भजन Lyrics 

 

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