तुलसीदास जी के दोहे

तुलसीदास जी के दोहे मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर । अस विचारि रघुवंशमनि हरहु विषम भवपीर ॥१॥ भव भुजङ्ग नकुल डसत ज्ञान हरि हर लेत। चित्रकूट…